Friday, June 5, 2026

the whitehall grid

द व्हाइटहॉल ग्रिड: भाग 3-

 'टुकड़े-टुकड़े फ्रंटियर' का सिंडिकेट – कश्मीर, पंजाब और तमिलनाडु का अदृश्य कॉरिडोर!

शृंखला के पिछले दो भागों में हमने देखा कि कैसे वैश्विक ताकतें भारत के भीतर राजनेताओं की अति-महत्वाकांक्षा को हवा देती हैं और कैसे तमिलनाडु के समुद्र तटों पर कुडनकुलम और स्टरलाइट जैसे सामरिक प्रोजेक्ट्स को ठप किया गया। 

लेकिन क्या ये आंदोलन बिखरे हुए हैं? क्या इनका आपस में कोई संबंध नहीं है? इस तीसरे भाग में हम राजनीति के उस सबसे बड़े और खतरनाक 'सिंडिकेट' का पर्दाफाश करेंगे, जिसके तार उत्तर की सरहद से लेकर दक्षिण के समंदर तक एक ही ग्लोबल स्क्रिप्ट से जुड़े हैं—

#यदि आप भारत के नक्शे को ध्यान से देखें, तो उत्तर में बर्फ से ढका कश्मीर और पांच नदियों का पंजाब है, जबकि सुदूर दक्षिण में तीन महासागरों को छूता तमिलनाडु है। भौगोलिक रूप से इनमें हजारों किलोमीटर की दूरी है। भाषा अलग है, संस्कृति अलग है और स्थानीय मुद्दे भी अलग हैं।

लेकिन अगर आप भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के गुप्त दस्तावेजों के चश्मे से देखें, तो इन तीनों राज्यों के भीतर एक समानांतर और बेहद खतरनाक 'अदृश्य कॉरिडोर' काम कर रहा है। वैश्विक 'डीप स्टेट' की रणनीति को डिकोड करने वाले इसे 'The Frontier Syndicate' कहते हैं।

#व्यवस्था को हिलाने का यह खेल इतना शातिर है कि इसमें चेहरे हमेशा स्थानीय और निर्दोष जनता के होते हैं, लेकिन उनकी स्क्रिप्ट लिखने वाला पेन हमेशा विदेशी होता है।

साल 2020-21 में जब दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ एक लंबा आंदोलन खड़ा हुआ, तो पूरी दुनिया ने 'Toolkit' शब्द पहली बार सुना। 

#वैश्विक पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने गलती से ट्विटर पर एक सीक्रेट टूलकिट लीक कर दी थी, जिसने पूरी दुनिया के सामने पोल खोल दी कि कैसे कनाडा, यूके और अमेरिका में बैठे कुछ खास संगठन भारत के भीतर आंदोलनों का शेड्यूल और नैरेटिव तय कर रहे थे।

किन्तु मुख्यधारा का मीडिया आपको जो नहीं बता सका, वह था इस टूलकिट का तमिलनाडु कनेक्शन!

 #पंजाब के किसान आंदोलन को हवा देने वाले और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'मानवाधिकार' का रोना रोने वाले कई डिजिटल संगठन और एक्टिविस्ट वही थे, जो तमिलनाडु में 'स्टरलाइट कॉपर' और 'कुडनकुलम' के समय इंटरनेट पर भारत सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगैंडा चला रहे थे।

 #खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पंजाब में सक्रिय कुछ अलगाववादी ताकतों (जैसे सिख फॉर जस्टिस) की फंडिंग के तार और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में विदेशी पैसों (FCRA) पर पलने वाले कुछ कट्टरपंथी एनजीओ के तार अंततः यूरोप के एक ही 'अनाम' डोनर नेटवर्क से जाकर जुड़ते हैं। उद्देश्य साफ था—उत्तर में भारत की कृषि को ठप करो, दक्षिण में भारत के उद्योगों को घुटनों पर लाओ।

दशकों तक कश्मीर की वादियों में सेना पर होने वाले पथराव और तथाकथित 'आजादी' के आंदोलनों के पीछे पाकिस्तान का हाथ तो था ही, लेकिन उसके पीछे वेस्टर्न थिंक-टैंक्स की एक बहुत बड़ी थ्योरी काम कर रही थी—"राइट टू सेल्फ-डिटरमिनेशन" (आत्मनिर्णय का अधिकार)। 

इस थ्योरी के तहत स्थानीय युवाओं के दिमाग में यह भरा जाता रहा कि "दिल्ली तुम पर हुकूमत कर रही है।"

जब धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में यह मॉडल पूरी तरह ध्वस्त हो गया, तो 'डीप स्टेट' ने इस पूरे सॉफ्टवेयर को उठाकर दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु की धरती पर शिफ्ट कर दिया!

तमिलनाडु में पिछले कुछ सालों से अचानक सोशल मीडिया पर एक नैरेटिव बहुत आक्रामक तरीके से चलाया जा रहा है—"North vs South"। 

#भाषा के विवाद को हवा देना, केंद्रीय टैक्स के बंटवारे को लेकर 'साउथ टैक्स मूवमेंट' खड़ा करना और युवाओं को यह समझाना कि 'दिल्ली' (केंद्र सरकार) तमिल संस्कृति को नष्ट करना चाहती है—यह कोई संयोग नहीं है।

कश्मीर में जो काम 'हुर्रियत' के नेता और विदेशी फंडेड सिविल सोसायटी करती थी, ठीक वही भाषा आज तमिलनाडु के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, विदेशी यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर और एक्टिविस्ट बोल रहे हैं। वे 'तमिल राष्ट्रवाद' को 'भारतीय राष्ट्रवाद' के खिलाफ खड़ा करने की गहरी साजिश रच रहे हैं।

यह सिंडिकेट कितना मजबूत है, इसे आप अमेरिकी और ब्रिटिश सरकारों की संसदीय रिपोर्टों से समझ सकते हैं। जब भी भारत सरकार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए तमिलनाडु के किसी संदिग्ध एनजीओ का एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस रद्द करती है या पंजाब/कश्मीर में अशांति फैलाने वाले किसी पोर्टल पर प्रतिबंध लगाती है, तो तुरंत प्रतिक्रिया वाशिंगटन या लंदन से आती है।

#अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं (जैसे एम्नेस्टी इंटरनेशनल) और विदेशी मीडिया अचानक भारत में 'लोकतन्त्र के खतरे' पर विशेष अंक प्रकाशित करने लगते हैं।

जैसा कि हमने भाग 2 में देखा, लुटियंस दिल्ली के बड़े नेता (जैसे राहुल गांधी और सोनिया गांधी) तुरंत इन अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव्स को भारत की संसद में उठाकर उन्हें घरेलू राजनीतिक मुद्दा बना देते हैं। 

इस प्रकार, वाशिंगटन से शुरू हुआ एक नैरेटिव चेन्नई के समुद्र तट से होता हुआ दिल्ली की संसद तक पहुँच जाता है। चक्रव्यूह की यह कतरन इतनी महीन है कि आम जनता इसे सिर्फ 'विपक्ष का विरोध' समझती है, जबकि यह एक गहरे सामरिक सिंडिकेट का हिस्सा होता है।

अब इस पूरी बिसात पर वापस लाकर रखिए के. अन्नामलाई को। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी होने के नाते, अन्नामलाई आंतरिक सुरक्षा के इस पूरे 'फ्रंटियर सिंडिकेट' और इसके फंडिंग पैटर्न को बहुत बारीकी से समझते हैं। 

#यही कारण था कि जब उन्होंने तमिलनाडु बीजेपी की कमान संभाली, तो उन्होंने द्रविड़ियन राजनीति के इस 'विदेशी-समर्थित' इकोसिस्टम पर सीधा प्रहार किया।

लेकिन यहीं पर 'डीप स्टेट' का सबसे क्रूर नियम लागू होता है—"यदि आप व्यवस्था को नहीं बदल सकते, तो व्यवस्था के भीतर मौजूद मोहरों को अपने पक्ष में कर लो।"

जब अन्नामलाई को इस सिंडिकेट की ताकत का अहसास हुआ और समानांतर रूप से उन्हें ऑक्सफोर्ड जैसी जगहों से 'ग्लोबल बैकिंग' मिलने लगी, तो उनकी खुद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने करवट बदल ली। 

कल तक जो नेता दिल्ली (मोदी-शाह) के विजन को तमिलनाडु में लागू करने के लिए लड़ रहा था, आज वही नेता दिल्ली को आंख दिखाकर '7 साल की स्वायत्तता' या 'अलग पार्टी' का अल्टीमेटम दे रहा है। 

यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि 'फ्रंटियर सिंडिकेट' ने तमिलनाडु में राष्ट्रवाद के सबसे बड़े चेहरे को ही अपनी शर्तों पर खेलने के लिए मजबूर कर दिया है।

#पंजाब की सरहद पर ट्रैक्टर गूंज रहे हैं, कश्मीर खामोशी की चादर ओढ़े बदलाव की राह देख रहा है, और तमिलनाडु के तटों पर अरबों रुपये का विदेशी नेटवर्क एक नए 'जन-आंदोलन' की जमीन तैयार कर रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है: क्या भारत का केंद्रीय नेतृत्व इस तिहरे मोर्चे की भयावहता को भांप पा रहा है? 

क्या दिल्ली अन्नामलाई की महत्वाकांक्षा के आगे घुटने टेककर तमिलनाडु को इस सिंडिकेट के हवाले कर देगी, या फिर राष्ट्रवाद के नाम पर एक नया और अभूतपूर्व काउंटर-ऑपरेशन शुरू होगा?

जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मोहरे जिस तेजी से अपनी जगह बदल रहे हैं, उससे साफ है कि शह और मात का यह खेल अब अंतिम दौर में प्रवेश कर चुका है।

यह चक्रव्यूह कितना भी गहरा क्यों न हो, भारत की सनातनी और सांस्कृतिक जड़ें हमेशा से इन वैश्विक ताकतों पर भारी पड़ी हैं।

#अगले और अंतिम भाग में हम बात करेंगे:
राष्ट्रवाद 2.0 – क्या भारत का New South Model इस वैश्विक नेटवर्क और 'डीप स्टेट' के सिंडिकेट को जमीनी स्तर पर शिकस्त देने के लिए तैयार है? और इस महासंग्राम का अंत क्या होगा?

पढ़ते रहिए, क्योंकि सत्य की परतें अब पूरी तरह खुलने वाली हैं।

     यह सीरीज कैसी लग रही है, अपनी टिप्पणियों में जरूर बताएं ।
 जयहिंद!Manoj Kumar Mishra
भाग-1 और 2 के लिंक कमेंट बॉक्स में.....

Tuesday, February 10, 2026

माफ करने दो ....

हम भारत के आम आदमी अपने खर्चे पर अपने खरीदने वाले सामान पर छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी जरूरत हो तक टैक्स चुकाते हैं और कैसे चुकाते हैं छोटी सी छोटी ₹1 की चीज एमआरपी देखकर खरीदें क्योंकि

Thursday, December 25, 2025

हिन्दुस्तान देश की तकनीक

जब पत्थर बोल उठे.... 

जब धरती बनी ड्रॉइंग बोर्ड: प्राचीन मंदिरों की अदृश्य इंजीनियरिंग!

हमारे पूर्वज कितने विशाल मंदिर बना सकते थे। लेकिन असली सवाल यह है – ये सब कैसे सम्भव हुआ? 

भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनाई गई इन तकनीकों को एक-एक करके समझते हैं।

जब भी कोई 80 टन का पत्थर 200 फीट ऊपर पहुँचता है, तो सबसे पहले सवाल उठता है – इसे ऊपर कैसे ले जाया गया? 

आधुनिक दुनिया का जवाब है: क्रेन। 

लेकिन 11वीं सदी में, तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में यह काम किया गया सिर्फ एक सीधे सिद्धांत के आधार पर – रैंप। 

कल्पना करिए, मंदिर के चारों ओर एक लंबा, धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता हुआ रास्ता – लगभग करीब 4 मील लंबा! यह रैंप मिट्टी, पत्थर और मलबे से बनाया गया था, जिसका ढाल इतना आहिस्ता था कि  #हाथी या बैलों की टीम भारी पत्थर को खींचते हुए ऊपर चढ़ सकती थी।

 सबसे पहले, मंदिर की चारदीवारी के साथ-साथ मिट्टी को धीरे-धीरे ऊपर की ओर समतल करते हुए रैंप बनाया जाता। यह रैंप सीधा नहीं होता, बल्कि सर्पिल आकार में होता, ताकि पत्थर को घुमावदार रास्ते पर ले जाना आसान हो।

 रास्ते में लकड़ी के बड़े-बड़े स्लीपर बिछाए जाते, जिन पर लकड़ी के गोल ठूँठ (रोलर) रखे जाते। पत्थर को एक लकड़ी के समतल ढाँचे (स्लेज) पर रखा जाता, और यह पूरा सेटअप उन गोल रोलरों पर बैठता था। अब, हज़ारों मजदूर और दर्जनों हाथी इस स्लेज को खींचते हुए रैंप पर ऊपर ले जाते। आगे की ओर रस्सियाँ, पीछे की ओर रस्सियाँ, और बीच में गाइड – पूरा ऑपरेशन एक सैनिक टीम जितना संगठित होता।

माइक्रो-लेवल इंजीनियरिंगअब सवाल यह है – इतने भारी पत्थर को जमीन पर कैसे लुढ़काया जाता था?  सबसे पहली बात यह समझें कि घर्षण (friction) एक बहुत बड़ी समस्या थी। अगर 80 टन का पत्थर सीधे जमीन पर रखा जाता और खींचने की कोशिश की जाती, तो घिसाव इतना ज़्यादा होता कि कोई भी ताकत उसे हिलाने में सफल नहीं हो सकती थी।

लेकिन हमारे पूर्वज इस समस्या को बहुत चतुराई से हल करते थे। वे लकड़ी के मोटे ठूँठों को (roller) पत्थर के नीचे रखते थे। ये ठूँठ गोलाकार होते थे, इसलिए जब पत्थर को खींचा जाता, यह ठूँठ्स घूमते रहते और पत्थर को आगे बढ़ाते। ज्यों-ज्यों पत्थर आगे बढ़ता, पीछे छूट गए ठूँठों को फिर से आगे की ओर रख दिया जाता।

 यानी, एक बार 10-15 रोलर्स सेट करने के बाद, जैसे-जैसे पत्थर आगे बढ़ता, पिछले रोलर्स को निकालकर आगे की ओर रख दिया जाता – ठीक वैसे ही, जैसे आज के कॉन्वेयर बेल्ट काम करते हैं!

  खजुराहो और हम्पी जैसे क्षेत्रों में, जहाँ दूरी ज़्यादा थी, रोलर्स को चर्बी या तेल से चिकना भी किया जाता था, ताकि फिसलना और रोलिंग दोनों संभव हो सकें। 

यह वास्तव में एक hybrid technique थी – आधी friction-reduction, आधी rolling !

पत्थर को सीधे रोलर्स पर नहीं रखा जाता। उसके लिए एक मजबूत लकड़ी का फ्रेम बनाया जाता, जिसे "स्लेज" कहते हैं। यह स्लेज एक आयताकार संरचना होती – मोटी लकड़ी के बीम को आड़े-तिरछे जोड़कर बनाई गई। पत्थर इसी स्लेज के ऊपर बैठता था, और स्लेज ही रोलर्स पर घूमता था।स्लेज बनाने में ज्यामिति का बहुत महत्वपूर्ण उपयोग होता था। 

पत्थर का वज़न पूरे स्लेज में समान रूप से वितरित होना चाहिए, नहीं तो एक ओर से ज़्यादा दबाव पड़ेगा और स्लेज टेढ़ा हो जाएगा, फिर खिसक सकता है। इसलिए, पत्थर के गुरुत्व केंद्र को पहले से ही गणना करके स्लेज तैयार किया जाता। 

मंदिरों में ऐसे बहुत सारे अवशेष मिले हैं जो दिखाते हैं कि स्लेज के तल में एक विशेष U-आकार की नाली होती थी, जो पत्थर को गिरने से बचाती थी और उसे सीधा रखती थी।

जब पत्थर रैंप पर ऊपर चढ़कर अपनी अंतिम मंज़िल पर पहुँचता था, तो अब का काम बहुत नाज़ुक हो जाता। यहाँ सिर्फ खींचना-तानना काफ़ी नहीं था; पत्थर को बिल्कुल सही जगह पर, बिल्कुल सही कोण पर बैठाना पड़ता था। यहाँ रस्सियों और उत्तोलक (lever) का उपयोग होता।

लीवर का सिद्धांत बहुत सरल है – एक लंबी लकड़ी को एक फुलक्रम (pivot point) पर रखो, फिर एक ओर से धक्का दो, दूसरी ओर भारी वस्तु ऊपर उठती है। 

बृहदेश्वर मंदिर में, जब वह 80 टन की शिला अपनी अंतिम जगह पर बैठने वाली थी, तो दर्जनों लकड़ी के लीवर एक साथ उपयोग किए जाते थे। हर लीवर को एक सटीक स्थान पर रखा जाता, और फिर सैकड़ों कारीगर एक साथ धक्का देते। रस्सियाँ दोनों ओर से जुड़ी होती थीं – कुछ पत्थर को खींचने के लिए, कुछ गाइड करने के लिए, और कुछ अगर कोई चीज़ गलत हो तो तुरंत पत्थर को सँभालने के लिए। 

महाबलीपुरम के "रथ": ऊर्ध्व खनन की सफलताअब चलते हैं दक्षिण के एक और विस्मयकारी उदाहरण की ओर – महाबलीपुरम  में पल्लव वंश द्वारा बनाए गए "रथ" । 

ये "रथ" दरअसल पूरे मंदिर नहीं, बल्कि एकल ग्रेनाइट शिलाखंड से तराशी गई #वास्तुकला-कृतियाँ हैं। सबसे प्रसिद्ध धर्मराज रथ, अर्जुन रथ, और गणेश रथ कहलाते हैं। इन "रथों" को बनाते समय ऊर्ध्व खनन तकनीक (vertical excavation) का उपयोग किया गया – जो एलोरा के कैलाश मंदिर के बिल्कुल समान सिद्धांत पर काम करती है, बस पैमाना छोटा है।

 #कारीगरों ने सबसे पहले ग्रेनाइट की विशाल शिला के ऊपरी हिस्से पर मंदिर का आकार चिन्हित किया। फिर, ऊपर से शुरू करके, धीरे-धीरे नीचे की ओर खोदते हुए, पूरी शिला से अनावश्यक पत्थर निकाल दिए। अंत में, जो रहा, वही मंदिर बन गया।

यहाँ कोई गलती अक्षम्य होती। एक बार अगर एक स्तंभ गलत कोण पर काट दिया जाता, या छत का कोई हिस्सा आवश्यकता से अधिक काट दिया जाता, तो पूरी शिला बर्बाद हो जाती। इसलिए, हर कट से पहले बहुत विचार-विमर्श होता। 

प्राचीन कारीगर रस्सी, खूंटी और चूने/रंग की मदद से ज़मीन पर वर्गाकार या आयताकार खानों वाला जाल (grid pattern) बनाते थे – इसे ही #वास्तु‑पुरुष मंडल या मंडल ज्यामिति कहा जाता है। इसी पर हर स्तंभ, दीवार, गलियारा, दरवाज़ा, और शिखर का सेंटर पॉइंट मार्क होता था, फिर उसी के अनुसार पत्थर बैठाए जाते थे।

अजंता की 30 गुफाएँ, जो घोड़े की नाल के आकार की घाटी में पहाड़ी की दीवार को काटकर बनाई गई थीं। यहाँ तकनीक ऊर्ध्व नहीं, बल्कि क्षैतिज (horizontal) थी।

 कारीगरों ने पहाड़ी की ऊँची दीवार पर एक प्रवेश द्वार बनाया, फिर धीरे-धीरे अंदर की ओर खुदाई करते हुए गुफा को चौड़ा किया। अंदर से ही स्तंभ निकाले गए, #बुद्ध की प्रतिमाएँ तराशी गईं, और दीवारों पर जातक कथाओं की चित्रकारी की गई।

अजंता की गुफाओं में सबसे दिलचस्प बात यह है कि गुफा के अंदर पानी का निकास कितनी सतर्कता से डिज़ाइन किया गया था। जब भारी बारिश होती, वर्षा का पानी बिना गुफा को नुकसान पहुँचाए, नीचे की ओर प्रवाहित हो सके, इसके लिए छोटी-छोटी नालियों को गुफा के अंदर ही काटा गया। 

 गुफाओं में चैत्य (बुद्ध के पूजास्थल) बनाए गए, जहाँ एक विशाल स्तूप पत्थर से ही तराशी गई। यह स्तूप लगभग 20-30 फीट ऊँचा होता, और पूरी तरह एक ही पत्थर की गुफा के भीतर उकेरी गई। 

अब सबसे अद्भुत उदाहरण – एलोरा की 34 गुफाएँ, जिनमें कैलाश मंदिर सबसे प्रसिद्ध है।
 
कैलाश मंदिर का निर्माण  में कारीगरों ने एक घाटी में खड़ी विशाल चट्टान को लिया और उसे ऊपर से नीचे खोदते-खोदते एक पूर्ण मंदिर परिसर निकाल दिया।

 एक पहाड़ की चोटी से शुरू करके, कारीगरों ने धीरे-धीरे अनावश्यक पत्थर को निकाला और जो रहा, उसी में से:96 फीट ऊँचा शिखर,विशाल प्रार्थना कक्ष, देवताओं की मूर्तियाँ, जटिल नक्काशी वाली दीवारें,भूमिगत भंडारण कक्ष, सीढ़ियाँ और गलियारे सब कुछ एक ही पत्थर से, कोई जोड़ नहीं, कोई अलग ब्लॉक नहीं।

आप सोचेंगे कि हज़ारों साल पहले शायद कोई जादुई तकनीक रही होगी। लेकिन असल में, औज़ार बहुत साधारण थे:लोहे की छेनी – विभिन्न चौड़ाई और आकार में, तेज़ धार वाले पत्थर के मुगदर– आमतौर पर 2-4 किलोग्राम का, पकड़ने के लिए लकड़ी की पकड़ के साथ पीतल या ताँबे की छेनी – नरम पत्थरों के लिए लकड़ी के उपकरण। 

 धातु विज्ञान उस समय बहुत उन्नत था। भारत में उच्च-कार्बन इस्पात  का उत्पादन होता था – वह दक्षिण भारत की "उत्ज पत्तन" जैसी जगहों से इस्पात  का निर्यात होता था, और यूरोप तक जाता था! 

इसी से छेनियाँ बनाई जाती थीं, जिनकी धार आज के स्टील की छेनियों के बराबर तीक्ष्ण थी।एक बार छेनी तेज़ हो गई, तो बाकी काम धैर्य और कौशल का था।

कारीगर दिन में 8-10 घंटे लगातार काम करते, हर दिन थोड़ा-थोड़ा पत्थर निकालते, और महीने-महीने, साल-साल इस प्रक्रिया को दोहराते। 

कहा जाता है कि कुछ मंदिरों में संगीत-वाद्य यंत्र बजाते-बजाते काम होता था, जिससे रिदम और मनोबल दोनों बने रहते!

Friday, September 24, 2021

नागरिक संशोधन

केंद्र सरकार द्वारा लाया गया "नागरिक संशोधन विधेयक" लोकसभा से पारित हो, राज्यसभा में बहुमत से पास हो, महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने स्वीकृति स्वरूप हस्ताक्षर करते हुए कानून व्यवस्था में एक नया सोपान जोड़ दिया जिसके फलस्वरूप अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिक और पड़ोसी देशों में रह रहे अल्पसंख्यक नागरिकों के लिए एक सकारात्मक पहल की है।

तमाम लोगों, संगठनों ने इस कानून का स्वागत किया है और इसके लिए केंद्र सरकार को धन्यवाद ज्ञापन भी किया है।

सब कुछ सही  फिर भी देश के कुछ हिस्सों में दंगे, प्रदर्शन और अराजकता का माहौल बना दिया गया है जो कि मीडिया भर भर कर दिखा रहा है, अखबारों में सुर्खियां बना रहे हैं लेकिन असल में इस बात को लेकर बेवजह ही परेशानी का माहौल दिखाने की कोशिश कौन कर रहा है सब भली भांति जानते हैं।

इस बात को कुछ यूं समझे कि 1947 में जब हमारे अखण्ड हिंदुस्तान में जो सिर्फ और सिर्फ धार्मिक आधार पर विभाजन हुआ था जिसका मकसद दो अलग अलग धर्मों के अनुयायियों को दो अलग देश बनाने की एक कुटिल मंशा तत्कालीन सत्तासुख भोगने की चाह रखने वालों के लिए हिंदू-मुस्लिम आधार पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान बना दिया गया ताकि एक भारतवर्ष के कई टुकड़े टुकड़े कर सभी को प्रधानमंत्री बनाया जा सके।

तब राष्ट्रपिता गाँधी ने नेहरू-जिन्ना दोनों की प्रधानमंत्री बनने की बालहठ के लिए अखण्ड भारतवर्ष के दो टुकड़े करके दोनों को खुश करने का अभूतपूर्व कार्य किया  

आजादी के समय हिन्दू समुदाय पाकिस्तान में खूब था और इतना था कि मुस्लिम समुदाय ने भरी हुई ट्रेन उनकी लाशों से भरके हिंदुस्तान में भेजी थी लेकिन तब भी पता नहीं क्यों कोई व्यापक कदम उठाने की जहमत तत्कालीन सरकार ने नही उठाई।


Sunday, June 21, 2020

संस्कृति का बीजारोपण

🚩🕉🚩

अक्सर लोग हिन्दू धर्म के संस्कारों को हेय दृष्टि से देखा करते है, कथित धर्मनिरपेक्षता में वे इतने अंधे हो गए कि उन्होंने भारतीय संस्कारों के घर मे प्रवेश करने पर ही प्रतिबंध लगा दिया है।

सनातन धर्म को मानने वाले हिन्दू अपने वैदिक संस्कारों तक को ठुकरा देने का निर्णय ही आज की दुर्दशा का जिम्मेवार है ।

कहते है बच्चों का दिमाग कोरी स्लेट होता है जिस पर हम जो चाहें लिख सकते हैं। यह प्रक्रिया जन्म से लेकर जवानी तक चलती है। अगर बच्चों को संस्कारी बनाना हो तो बड़ों को अपने दायित्व से नहीं चूकना चाहिए। बच्चों को संस्कार उपदेश देकर नहीं सिखाए जा सकते। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे माता-पिता को करते देखते हैं। जैसे वरिष्ठजनों के गुण होंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। जो वे करते होंगे वैसा बच्चे करेंगे।

आप अपने बच्चों को अरबों की सम्पत्ति तो विरासत तो में दे जाएंगे लेकिन संस्कार नही दे पाए तो भयावहता की कल्पना कर सकते हैं। जीवन भर भारतीय मूल्यों का अघोषित बहिष्कार किया हो, सनातनी  संस्कृति का अपमान कर जो बीज बोया जाता है उस के फल भविष्य में पूरे समाज, देश और संस्कृति को काटने पड़तेहै।

ईश्वर सबको सद्बुद्धि देवें कि वो संस्कारों का बीजारोपण अपनी भावी और वर्तमान युवा पीढ़ी में करेंगे तभी होगा सनातन धर्म और संस्कृति का अभ्युदय।

जो धर्म को दृढ़ रखे,
तेहि राखे करतार।।

सत्येन🖊🚩

Wednesday, December 25, 2019

शिव तांडव स्तोत्रं

शिव ताण्डव स्तोत्र
जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले
गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा
निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगल ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं
विमोहनं हि देहिनांं सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Sunday, September 15, 2019

कविता : अधूरा डर

यूँ ये सफर सिफर हो जाता है,
अकेले कोई कहाँ चल पाता है ।
जिंदगी तो काट लेता है तन्हा भी,
कोई क्या जी हर पल पाता है ।

अधूरी रह जाती है कुछ कहानियां अक्सर,
यूँ पूरी भी कहाँ हर कोई लिख पाता है ।
परियाँ आती है रोज ख्वाबों में मेरे अब भी,
वो बचपन मेरा कहाँ वापस लौट के आता है ।

सोचता हूँ की खेल खेलूँ वो पुराने वाले,
वो हारने का डर अब भी सताता है ।
तब तो तुम साथ हर पल थे मेरे साये से,
जमाने की चाल से अब दिल डर जाता है ।

सत्येन