Satyen auR uski Duniya...
Friday, June 5, 2026
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Tuesday, February 10, 2026
माफ करने दो ....
हम भारत के आम आदमी अपने खर्चे पर अपने खरीदने वाले सामान पर छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी जरूरत हो तक टैक्स चुकाते हैं और कैसे चुकाते हैं छोटी सी छोटी ₹1 की चीज एमआरपी देखकर खरीदें क्योंकि
Thursday, December 25, 2025
हिन्दुस्तान देश की तकनीक
Friday, September 24, 2021
नागरिक संशोधन
Sunday, June 21, 2020
संस्कृति का बीजारोपण
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अक्सर लोग हिन्दू धर्म के संस्कारों को हेय दृष्टि से देखा करते है, कथित धर्मनिरपेक्षता में वे इतने अंधे हो गए कि उन्होंने भारतीय संस्कारों के घर मे प्रवेश करने पर ही प्रतिबंध लगा दिया है।
सनातन धर्म को मानने वाले हिन्दू अपने वैदिक संस्कारों तक को ठुकरा देने का निर्णय ही आज की दुर्दशा का जिम्मेवार है ।
कहते है बच्चों का दिमाग कोरी स्लेट होता है जिस पर हम जो चाहें लिख सकते हैं। यह प्रक्रिया जन्म से लेकर जवानी तक चलती है। अगर बच्चों को संस्कारी बनाना हो तो बड़ों को अपने दायित्व से नहीं चूकना चाहिए। बच्चों को संस्कार उपदेश देकर नहीं सिखाए जा सकते। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे माता-पिता को करते देखते हैं। जैसे वरिष्ठजनों के गुण होंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। जो वे करते होंगे वैसा बच्चे करेंगे।
आप अपने बच्चों को अरबों की सम्पत्ति तो विरासत तो में दे जाएंगे लेकिन संस्कार नही दे पाए तो भयावहता की कल्पना कर सकते हैं। जीवन भर भारतीय मूल्यों का अघोषित बहिष्कार किया हो, सनातनी संस्कृति का अपमान कर जो बीज बोया जाता है उस के फल भविष्य में पूरे समाज, देश और संस्कृति को काटने पड़तेहै।
ईश्वर सबको सद्बुद्धि देवें कि वो संस्कारों का बीजारोपण अपनी भावी और वर्तमान युवा पीढ़ी में करेंगे तभी होगा सनातन धर्म और संस्कृति का अभ्युदय।
जो धर्म को दृढ़ रखे,
तेहि राखे करतार।।
सत्येन🖊🚩
Wednesday, December 25, 2019
शिव तांडव स्तोत्रं
शिव ताण्डव स्तोत्र
जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले
गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्।डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम् ॥१॥
जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा
निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्।सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगल ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं
विमोहनं हि देहिनांं सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
Sunday, September 15, 2019
कविता : अधूरा डर
यूँ ये सफर सिफर हो जाता है,
अकेले कोई कहाँ चल पाता है ।
जिंदगी तो काट लेता है तन्हा भी,
कोई क्या जी हर पल पाता है ।
अधूरी रह जाती है कुछ कहानियां अक्सर,
यूँ पूरी भी कहाँ हर कोई लिख पाता है ।
परियाँ आती है रोज ख्वाबों में मेरे अब भी,
वो बचपन मेरा कहाँ वापस लौट के आता है ।
सोचता हूँ की खेल खेलूँ वो पुराने वाले,
वो हारने का डर अब भी सताता है ।
तब तो तुम साथ हर पल थे मेरे साये से,
जमाने की चाल से अब दिल डर जाता है ।
सत्येन