'टुकड़े-टुकड़े फ्रंटियर' का सिंडिकेट – कश्मीर, पंजाब और तमिलनाडु का अदृश्य कॉरिडोर!
शृंखला के पिछले दो भागों में हमने देखा कि कैसे वैश्विक ताकतें भारत के भीतर राजनेताओं की अति-महत्वाकांक्षा को हवा देती हैं और कैसे तमिलनाडु के समुद्र तटों पर कुडनकुलम और स्टरलाइट जैसे सामरिक प्रोजेक्ट्स को ठप किया गया।
लेकिन क्या ये आंदोलन बिखरे हुए हैं? क्या इनका आपस में कोई संबंध नहीं है? इस तीसरे भाग में हम राजनीति के उस सबसे बड़े और खतरनाक 'सिंडिकेट' का पर्दाफाश करेंगे, जिसके तार उत्तर की सरहद से लेकर दक्षिण के समंदर तक एक ही ग्लोबल स्क्रिप्ट से जुड़े हैं—
#यदि आप भारत के नक्शे को ध्यान से देखें, तो उत्तर में बर्फ से ढका कश्मीर और पांच नदियों का पंजाब है, जबकि सुदूर दक्षिण में तीन महासागरों को छूता तमिलनाडु है। भौगोलिक रूप से इनमें हजारों किलोमीटर की दूरी है। भाषा अलग है, संस्कृति अलग है और स्थानीय मुद्दे भी अलग हैं।
लेकिन अगर आप भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के गुप्त दस्तावेजों के चश्मे से देखें, तो इन तीनों राज्यों के भीतर एक समानांतर और बेहद खतरनाक 'अदृश्य कॉरिडोर' काम कर रहा है। वैश्विक 'डीप स्टेट' की रणनीति को डिकोड करने वाले इसे 'The Frontier Syndicate' कहते हैं।
#व्यवस्था को हिलाने का यह खेल इतना शातिर है कि इसमें चेहरे हमेशा स्थानीय और निर्दोष जनता के होते हैं, लेकिन उनकी स्क्रिप्ट लिखने वाला पेन हमेशा विदेशी होता है।
साल 2020-21 में जब दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ एक लंबा आंदोलन खड़ा हुआ, तो पूरी दुनिया ने 'Toolkit' शब्द पहली बार सुना।
#वैश्विक पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने गलती से ट्विटर पर एक सीक्रेट टूलकिट लीक कर दी थी, जिसने पूरी दुनिया के सामने पोल खोल दी कि कैसे कनाडा, यूके और अमेरिका में बैठे कुछ खास संगठन भारत के भीतर आंदोलनों का शेड्यूल और नैरेटिव तय कर रहे थे।
किन्तु मुख्यधारा का मीडिया आपको जो नहीं बता सका, वह था इस टूलकिट का तमिलनाडु कनेक्शन!
#पंजाब के किसान आंदोलन को हवा देने वाले और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'मानवाधिकार' का रोना रोने वाले कई डिजिटल संगठन और एक्टिविस्ट वही थे, जो तमिलनाडु में 'स्टरलाइट कॉपर' और 'कुडनकुलम' के समय इंटरनेट पर भारत सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगैंडा चला रहे थे।
#खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पंजाब में सक्रिय कुछ अलगाववादी ताकतों (जैसे सिख फॉर जस्टिस) की फंडिंग के तार और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में विदेशी पैसों (FCRA) पर पलने वाले कुछ कट्टरपंथी एनजीओ के तार अंततः यूरोप के एक ही 'अनाम' डोनर नेटवर्क से जाकर जुड़ते हैं। उद्देश्य साफ था—उत्तर में भारत की कृषि को ठप करो, दक्षिण में भारत के उद्योगों को घुटनों पर लाओ।
दशकों तक कश्मीर की वादियों में सेना पर होने वाले पथराव और तथाकथित 'आजादी' के आंदोलनों के पीछे पाकिस्तान का हाथ तो था ही, लेकिन उसके पीछे वेस्टर्न थिंक-टैंक्स की एक बहुत बड़ी थ्योरी काम कर रही थी—"राइट टू सेल्फ-डिटरमिनेशन" (आत्मनिर्णय का अधिकार)।
इस थ्योरी के तहत स्थानीय युवाओं के दिमाग में यह भरा जाता रहा कि "दिल्ली तुम पर हुकूमत कर रही है।"
जब धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में यह मॉडल पूरी तरह ध्वस्त हो गया, तो 'डीप स्टेट' ने इस पूरे सॉफ्टवेयर को उठाकर दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु की धरती पर शिफ्ट कर दिया!
तमिलनाडु में पिछले कुछ सालों से अचानक सोशल मीडिया पर एक नैरेटिव बहुत आक्रामक तरीके से चलाया जा रहा है—"North vs South"।
#भाषा के विवाद को हवा देना, केंद्रीय टैक्स के बंटवारे को लेकर 'साउथ टैक्स मूवमेंट' खड़ा करना और युवाओं को यह समझाना कि 'दिल्ली' (केंद्र सरकार) तमिल संस्कृति को नष्ट करना चाहती है—यह कोई संयोग नहीं है।
कश्मीर में जो काम 'हुर्रियत' के नेता और विदेशी फंडेड सिविल सोसायटी करती थी, ठीक वही भाषा आज तमिलनाडु के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, विदेशी यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर और एक्टिविस्ट बोल रहे हैं। वे 'तमिल राष्ट्रवाद' को 'भारतीय राष्ट्रवाद' के खिलाफ खड़ा करने की गहरी साजिश रच रहे हैं।
यह सिंडिकेट कितना मजबूत है, इसे आप अमेरिकी और ब्रिटिश सरकारों की संसदीय रिपोर्टों से समझ सकते हैं। जब भी भारत सरकार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए तमिलनाडु के किसी संदिग्ध एनजीओ का एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस रद्द करती है या पंजाब/कश्मीर में अशांति फैलाने वाले किसी पोर्टल पर प्रतिबंध लगाती है, तो तुरंत प्रतिक्रिया वाशिंगटन या लंदन से आती है।
#अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं (जैसे एम्नेस्टी इंटरनेशनल) और विदेशी मीडिया अचानक भारत में 'लोकतन्त्र के खतरे' पर विशेष अंक प्रकाशित करने लगते हैं।
जैसा कि हमने भाग 2 में देखा, लुटियंस दिल्ली के बड़े नेता (जैसे राहुल गांधी और सोनिया गांधी) तुरंत इन अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव्स को भारत की संसद में उठाकर उन्हें घरेलू राजनीतिक मुद्दा बना देते हैं।
इस प्रकार, वाशिंगटन से शुरू हुआ एक नैरेटिव चेन्नई के समुद्र तट से होता हुआ दिल्ली की संसद तक पहुँच जाता है। चक्रव्यूह की यह कतरन इतनी महीन है कि आम जनता इसे सिर्फ 'विपक्ष का विरोध' समझती है, जबकि यह एक गहरे सामरिक सिंडिकेट का हिस्सा होता है।
अब इस पूरी बिसात पर वापस लाकर रखिए के. अन्नामलाई को। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी होने के नाते, अन्नामलाई आंतरिक सुरक्षा के इस पूरे 'फ्रंटियर सिंडिकेट' और इसके फंडिंग पैटर्न को बहुत बारीकी से समझते हैं।
#यही कारण था कि जब उन्होंने तमिलनाडु बीजेपी की कमान संभाली, तो उन्होंने द्रविड़ियन राजनीति के इस 'विदेशी-समर्थित' इकोसिस्टम पर सीधा प्रहार किया।
लेकिन यहीं पर 'डीप स्टेट' का सबसे क्रूर नियम लागू होता है—"यदि आप व्यवस्था को नहीं बदल सकते, तो व्यवस्था के भीतर मौजूद मोहरों को अपने पक्ष में कर लो।"
जब अन्नामलाई को इस सिंडिकेट की ताकत का अहसास हुआ और समानांतर रूप से उन्हें ऑक्सफोर्ड जैसी जगहों से 'ग्लोबल बैकिंग' मिलने लगी, तो उनकी खुद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने करवट बदल ली।
कल तक जो नेता दिल्ली (मोदी-शाह) के विजन को तमिलनाडु में लागू करने के लिए लड़ रहा था, आज वही नेता दिल्ली को आंख दिखाकर '7 साल की स्वायत्तता' या 'अलग पार्टी' का अल्टीमेटम दे रहा है।
यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि 'फ्रंटियर सिंडिकेट' ने तमिलनाडु में राष्ट्रवाद के सबसे बड़े चेहरे को ही अपनी शर्तों पर खेलने के लिए मजबूर कर दिया है।
#पंजाब की सरहद पर ट्रैक्टर गूंज रहे हैं, कश्मीर खामोशी की चादर ओढ़े बदलाव की राह देख रहा है, और तमिलनाडु के तटों पर अरबों रुपये का विदेशी नेटवर्क एक नए 'जन-आंदोलन' की जमीन तैयार कर रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है: क्या भारत का केंद्रीय नेतृत्व इस तिहरे मोर्चे की भयावहता को भांप पा रहा है?
क्या दिल्ली अन्नामलाई की महत्वाकांक्षा के आगे घुटने टेककर तमिलनाडु को इस सिंडिकेट के हवाले कर देगी, या फिर राष्ट्रवाद के नाम पर एक नया और अभूतपूर्व काउंटर-ऑपरेशन शुरू होगा?
जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मोहरे जिस तेजी से अपनी जगह बदल रहे हैं, उससे साफ है कि शह और मात का यह खेल अब अंतिम दौर में प्रवेश कर चुका है।
यह चक्रव्यूह कितना भी गहरा क्यों न हो, भारत की सनातनी और सांस्कृतिक जड़ें हमेशा से इन वैश्विक ताकतों पर भारी पड़ी हैं।
#अगले और अंतिम भाग में हम बात करेंगे:
राष्ट्रवाद 2.0 – क्या भारत का New South Model इस वैश्विक नेटवर्क और 'डीप स्टेट' के सिंडिकेट को जमीनी स्तर पर शिकस्त देने के लिए तैयार है? और इस महासंग्राम का अंत क्या होगा?
पढ़ते रहिए, क्योंकि सत्य की परतें अब पूरी तरह खुलने वाली हैं।
यह सीरीज कैसी लग रही है, अपनी टिप्पणियों में जरूर बताएं ।
जयहिंद!Manoj Kumar Mishra
भाग-1 और 2 के लिंक कमेंट बॉक्स में.....